भोंपूराम खबरी,रुद्रपुर। नगर निगम सभागार में युवा कवि डॉ. जयंत साह की शोधपरक पुस्तक ‘गीतांजलि और छायावाद तुलनात्मक-अध्ययन’ का विमोचन प्रसिद्ध साहित्यकार और भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक डॉ लीलाधर मंडलोई, चर्चित कवि मदन कश्यप, कवि कस्तूरीलाल तागरा और शंकर चक्रवर्ती द्वारा सम्पन्न किया गया। किताब को ‘समय साक्ष्य’ देहरादून की प्रकाशन संस्था ने प्रकाशित की है जिस पर कई दृष्टिकोण से व्यापक परिचर्चा हुई।
मुख्य अतिथि लीलाधर मंडलोई ने हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण कड़ी छायावाद पर अपना वक्तय देते हुए कहा कि प्रेम, दर्शन, सौंदर्य और स्वयं की अनुभूति के परिणामस्वरूप ही हिंदी साहित्य के आधुनिक युग में छायावाद का उदय हुआ। मनुष्यता, प्रकृति चित्रण, प्रेम और नारी चित्रण के साथ छायावाद की एक बड़ी विशेषता रहस्यवाद भी है। कहा कि जयशंकर प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पन्त हिंदी साहित्य के इस कालखंड के प्रमुख कवि थे। अपने वक्तव्य में मंडलोई जी ने रवींद्रनाथ टैगोर, गीतांजलि, और नवजागरण को भी रेखांकित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि टैगोर जी की कालजयी कृति ‘गीतांजलि’ 1913 में जब प्रतिष्ठित नोबल पुरस्कार से सम्मानित हुई तो यह टैगोर की आत्म-सरल अभिव्यक्ति, उनकी व्यापक दृष्टि, मानवता एवं साहित्य के वास्तविक उद्देश्य का सम्मान था। स्वाभाविक है कि इसका प्रभाव बाद के कवियों पर भी पड़ा। कवि-लेखक कस्तूरीलाल तागरा ने छायावाद की कोमल अभिव्यक्तियों को ‘सर्वे भवन्तु सुखिना’ से जोड़कर देखा और कहा कि मनुष्य,मनुष्यता और साहित्य का मूल भी यही है। कार्यक्रम में शंकर चक्रवर्ती और समय साक्ष्य प्रकाशन के प्रवीण भट्ट ने अपने विचार प्रस्तुत किए और प्रदीप रॉय द्वारा रवींद्र संगीत तथा काव्या जैन द्वारा काव्य की मनमोहक प्रस्तुति भी दी गई। इस अवसर पर कथाकार गंभीर सिंह पालनी, पलाश विश्वास, खेमकरण ‘सोमन’, उत्तम दत्ता, समीर रॉय, मनोज रॉय, नारायण महाजन, मोहन उपाध्याय, विकास सरकार, संजय श्रीनेत, हेम पन्त और सुरेंद्र जैन आदि कवि-लेखक उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी दिल्ली के सहायक निदेशक जैनेंद्र सिंह द्वारा किया गया।



