भोंपूराम खबरी, रुद्रपुर। कोरोना महामारी एक ऐसा काल बनकर आई है कि हर इन्सान सब कुछ छोड़कर मानो बस अपनी जान बचाना चाहता हो। इस महामारी ने न जाने कितनों को अपनों से जुदा कर दिया और न जाने अभी यह कोरोना महामारी कितनों को अपने आगोश में ले जाने के लिए विषैली घात लगाए हुए है। कोरोना को आए हुए लगभग डेढ़ वर्ष हो चुका है। इससे संक्रमण फैलने पर सबसे पहले शिक्षण संस्थानों को बंद किया गया था। अब लगभग सवा साल बाद भी शिक्षा व्यवस्था सुचारू नहीं हो पाई है। कहने को तो डिजिटल माध्यम को ऑफलाइन शिक्षा का विकल्प बताया जा रहा है। लेकिन शिक्षा के लिए एक माहौल, परिवेश व गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिससे समस्त विद्यार्थी समाज कोरोना के कारण वंचित हो गया है।
लॉकडाउन भी फिर से लागू है और विद्यार्थी असमंजस में हैं कि कोरोना से सुरक्षा हो, शिक्षा हो या इन दोनों के बाद बात परीक्षा तक पहुंचेगी भी या नहीं। कई विद्यार्थियों को सीधे अगली कक्षाओं में प्रोन्नत कर दिया गया। लेकिन योग्यता का पैमाना इस प्रोन्नति प्रक्रिया से दूर रहा। लेकिन सरकार व शिक्षा विभाग इसके अलावा कुछ नहीं कर सकते थे। शासन या तो जीरो वर्ष घोषित करता या एक वर्ष के नुकसान की भरपाई पदोन्नति से करते और हुआ भी ऐसा ही। लेकिन अब इतने लंबे समय से घरों में कैद विद्यार्थी, चाहे वह स्कूल हो या महाविद्यालय, सभी एक मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं। उन्हें अपने भविष्य की चिंता सता रही है और उनके आत्म्सिश्वास में भी कमी आ रही है। उनके अनेक सवाल हैं जो उन्हें अवसाद और घुटन की ओर ले जा रहे हैं। विद्यार्थी वर्ग शिक्षा तो चाहता है मगर परिस्थितियों के आगे नतमस्तक है। कोरोना लोगों को ग्रास बना रहा है। इस महामारी के दौरान विद्यार्थियों का जीवन अस्त-व्यस्त होता जा रहा है। परीक्षाओं का नहीं पता, प्रतियोगात्मक परीक्षाओं का कोई हाल नहीं। वहीं छोटे बच्चों का और बुरा हाल है। बीते सवा साल से स्कूल का प्रांगण भी नहीं देख पाए ये बच्चे घरों में कैद हैं जो उनकी मनस्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।



